बिना काम के मैंने कभी किसी स्‍टूडियो में रात को रुकना पसंद नहीं किया- तनुप्रियंका

गायन मात्र कला ही नहीं, बल्‍कि एक साधना है, एक उपासना है। इसीलिए गायक हो या गायिका, जो भी इसे साधना और उपासना समझता है, सरस्‍वती की कृपा भी उसी पर बरसती है। भोजपुरी गीत-संगीत की दुनिया में ऐसी ही विचारधारा वाला एक नाम आगे बढ़कर अपनी एक अलग पहचान दर्ज करा रहा है और वो हैं तनुप्रियंका सिंह। लोग पहले उन्‍हें प्रियंका सिंह नाम से जानते थे, लेकिन कई प्रियंकाओं के आने के बाद उन्‍होंने अश्‍लीलता की उस जमात से खुद को अलग कर अपने नाम में ‘तनु’ जोड़ लिया।

तनुप्रियंका वाराणसी की रहनेवाली हैं और उन्‍होंने मनोविज्ञान से पोस्‍ट ग्रेजुएशन किया हुआ है। जरा सोचिए….कहां मनोविज्ञान और कहां गायन….सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि कहीं गीत-संगीत उनके खून में तो नहीं है? ‘‘जी नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है’’ तनुप्रियंका मुस्‍कराते हुए जवाब देती हैं,‘‘ हां, मेरी मां पारंपरिक गीत बहुत खूबसूरती के साथ जरूर गाती थीं, इसलिए शादी-ब्‍याह में औरतें उनकी राह देखा करती थीं। मेरे दादा को सितार बजाने का शौक था। वो रेलवे कर्मचारी थे। अचानक दादा जी का अंतकाल हो जाने के कारण मेरे पापा को रेलवे में काम मिल गया। पापा के मन में ये ख्‍वाहिश जरूर जगती रहती थी कि काश मेरा कोई बच्‍चा सितार बजाता।’’

तबकी नन्‍हीं प्रियंका और आज की तनुप्रियंका को क्‍या ये याद है कि उसने कब गाना शुरू किया? ‘‘बेशक याद है। जानते हैं, जब तीन साल की थी, तभी से मैंने एक-एक दो-दो लाइनें गाना शुरू कर दिया था। स्कूल में होनेवाले डिबेट वगैरह में थोड़ा-बहुत हिस्‍सा भी लिया करती थी। जब मैं दसवीं में थी, उस समय की एक मजेदार बात बताती हूं। स्‍कूल में एक सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आयोजित होनेवाला था। हमारे टीचर कहते थे कि जिन लोगों को लगता है कि वो अच्‍छा गाते हैं, वो रुक जायेंगे। पढ़ाई खत्‍म होने के बाद गाने का रियाज कराया जायेगा। मुझे लगता था कि मैं तो अच्‍छा गाती ही नहीं, सो मैं क्‍लास खत्‍म होते ही उठकर घर चली जाया करती थी। मेरे टीचर को मेरी क्‍लास के कुछ दोस्‍तों ने बताया कि मैं बहुत अच्‍छा गाती हूं तो उन्‍होंने मुझे जबर्दस्‍ती रोक लिया। कहने का मतलब ये कि मैं अपने को अंडरएस्‍टिमेट किया करती थी। मुझे आज भी बखूबी याद है कि स्‍कूल के मंच पर मैंने पहली बार जिस गीत को गाया था, वो था ‘ऐ मेरे वतन के लोगो…।’ उस गीत के लिए मुझे काफी प्रशंसा मिली। उन्‍हीं दिनों मेरे स्‍कूल में एक सिंगिंग कंपिटीशन की तैयारी चल रही थी। उस तैयारी में मेरे साथ कई सीनियर स्‍टूडेंट्स भी हिस्‍सा ले रहे थे। अशोक पांडेय जी तबले के साथ हम सभी को प्रैक्‍टिस करवा रहे थे। लंच ब्रेक के दौरान उन्‍होंने कहा कि ‘मोहरा’ के एक गीत में जो सरगम वाला हिस्‍सा है, उसे मेरे तबला वादन के साथ कौन गा सकता है? मेरे सभी सीनियर्स ने मना कर दिया, लेकिन मैं गाने के लिए तैयार हो गयी। मुझे देखते ही अशोक जी चकित हो गये। उन्‍होंने मुझसे पूछा कि क्‍या मैं सचमुच उसे गा लूंगी। मैंने हां कह दिया। फिर मैंने उनके तबले की संगत में जिस तरह से गाया, उसे सुनकर वो बहुत खुश हुए। दरअसल, मैंने उसे उसी अंदाज में गाया था, जैसा वो चाह रहे थे।

प्रियंका का बात करने का अपना एक अलग अंदाज है। किसी वक्‍ता की तरह बोलती हैं। आगे की कहानी वो बताती हैं, ‘‘उसके बाद ऑडिशन देने का सिलसिला शुरू हो गया। चूंकि मुझे अशोक जी ने अपना रिफरेंस देने को कहा था, इसलिए जहां भी ऑडिशन में जाती, उनका रिफरेंस अवश्‍य दिया करती थी। साथ में रियाज तो जारी था ही। फिर धीरे-धीरे गाने के मौके मिलने लगे और मैं बिंदास गाने लगी। मेरे घरवालों को ये एहसास ही नहीं था कि मैं अच्‍छा गाती हूं। मेरे पापा को इसका यकीन तब आया, जब एक दिन प्रेस से कुछ लोग मेरा इंटरव्‍यू करने मेरे घर आ गये। तब मेरे पापा ने मुझसे कहा- अच्‍छा गा लेती हो? जवाब में मैंने कुछ नहीं बोला। फिर उन्‍होंने खुद ही कहा कि वो मेरा रिहर्सल देखना चाहते हैं। उस रिहर्सल में मुझे डुएट गाना था, लेकिन पापा को सामने देखने के बाद सारा मामला गड़बड़ हो गया। जानते हैं, जैसे ही उनकी ओर मेरा ध्‍यान जाता, मुझे मेरे शब्‍द ही भूल जा रहे थे। घर आकर मैंने मम्‍मी से कह दिया कि रिहर्सल में मेरे साथ पापा को मत भेजो। तुम खुद चला करो। उनके सामने मुझे गाने में कंफर्टेबल फील नहीं हो रहा है।’’

तनुप्रियंका से अगर आप बात करेंगे तो हर दो-तीन वाक्‍य के बाद आपको ‘ठीक है न’ शब्‍द सुनने को जरूर मिल जाया करेगा। आज से नहीं, काफी पहले से ये उनकी आदत में शुमार है। ये ‘ठीक है न’ वाला वीडियो तो बहुत बाद में वायरल हुआ है, जिसमें एक लड़की ने एक लड़के के साथ भाग कर शादी करने की बात करने के दौरान बार-बार ‘ठीक है न’ कहा था। मौके का फायदा उठाने में माहिर इंडस्‍ट्री के तमाम नकलची गायक-गायिकाओं ने बाद में उसे जमकर भुनाया और व्‍यूज दिखा-दिखा कर कॉलर भी खूब टाइट किया।

जब कोई सिंगर किसी गीत को नहीं गा पाती थी, तो लोग मुझे बुलाते थे

बातचीत का दौर आगे बढ़ता है तो तनु कहती हैं, ‘‘उन दिनों बनारस में रिकॉर्ड होनेवाले किसी भी गीत को जब कोई फीमेल सिंगर ठीक तरह से नहीं गा पाती थी, तो लोग मुझे याद करते थे। इसका कारण यही था कि मेरी रेंज काफी थी। मेरी आवाज में वो दम-खम था कि किसी भी तरह का नोट वाला गाना हो, सहजता के साथ गा लेती थी। इसी खूबी के चलते एक सिंगर के तौर पर मेरा नाम बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगा। फिर मैंने रिलायंस का 500 रुपये वाला फोन खरीदा और बनारस के कुछ स्‍टूडियो में अपना वह नंबर दे दिया। मैंने ऐसा इसलिए किया कि जरूरत पड़ने पर कोई भी मुझसे आसानी से संपर्क कर सके। साथ ही ये भी साफ-साफ कह दिया था कि मैं केवल काम से काम रखती हूं। असल में मेरी पहले से ही एक आदत थी- बिना किसी उचित काम के न तो मैं स्‍टूडियों में अपना समय देती थी और न ही मेरे पास अन्‍यथा किसी और काम के लिए वक्‍त ही था। जानते हैं, शुरूआत मैंने कोरस से की थी और मात्र 6 महीनों में लीड सिंगर बन गयी। कोरस के लिए जहां मात्र 400 रुपये मिलते थे, वहीं लीड सिंगर के बनने के बाद 4000 मिलने लग गये।’’

तनु की एक खासियत और भी है। वो हाजिर जवाब हैं। सवाल कोई भी हो, माकूल जवाब हाजिर रहता है। एक बात और, उनके साथ जो लोग अच्‍छा बर्ताव करते हैं, वो उनके साथ बेहद सहजता से पेश आती हैं, उनका सम्‍मान भी खूब करती हैं, लेकिन टेढ़े लोगों को उनकी ही भाषा में समझाना भी वो अच्‍छी तरह जानती हैं। उनके इसी अक्‍खड़ मिजाज या यूं कहें कि फालतू लोगों की मंडली का हिस्‍सा बनने से इंकार करने की वजह से बनारस में एक समय लोगों ने उनसे गवाना ही बंद कर दिया था, लेकिन तनु ने अपने उसूलों से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया। वो कहती हैं, ‘‘स्‍टूडियो में जब तक रिकॉर्डिंग चलती थी, तभी तक रुकती थी मैं। अगर रात के दो बजे भी रिकॉर्डिंग खत्‍म होती थी तो मैं अपने घर चली जाया करती थी, भले ही सुबह सात बजे स्‍टूडियो वापस क्‍यों न आना हो। किसी स्‍टूडियो में बिना किसी उचित काम के रात बिताना मुझे पसंद नहीं था। मेरी गायन की दुनिया में बदलाव की बयार का एक हल्‍का झोंका तब आया, जब वेव के खुदुस जी का मेरे पास फोन आया। उन दिनों वो वेव का ऑडियो सेक्‍शन देखा करते थे। लेकिन वहां भी मेरे साथ खेल किया गया। गाने वेव के नाम पर गवाये गये, रिलीज किसी लोकल कंपनी से कर दिया गया। मेरा पहला एलबम जो आया था, उसका शीर्षक था ‘मांगेला चुम्‍मा रंगदारी में’।’’  

मेरे ही गीत को गाकर इंदू सोनाली ने भोजपुरी इंडस्‍ट्री में कदम रखा

चाय की चुस्‍कियों के बीच तनु आगे कहती हैं, ‘‘यूं ही वक्‍त गुजर रहा था कि मुझे अचानक थायराइड की बीमारी हो गयी। मेरे लिए ये बहुत परेशानी वाली बात थी। सेहत पहले, ऐसा सोचकर मैंने पहले अपना इलाज करवाया। फिर स्‍वस्‍थ होने के बाद जो दूसरा एलबम रिकॉर्ड किया, उसने तहलका मचा दिया। मेरे उस एलबम का नाम था ‘नथुनिया जबसे पहिरले बानी’। सारे बैंडों पर खूब बजा ये गीत। कोई भी सिंगर नहीं बची होगी, जिसने मेरे इस गीत को गाकर ठुमके न लगाये हों। मजे की बात ये है कि टी सीरीज ने मेरे इसी एलबम को दोबारा मुझसे रिकॉर्ड करवाया और उसके एवज में मुझे 4,00,000 रुपये दिये। उस एलबम का कमाल देखिए कि दुबारा भी वो जबर्दस्‍त हिट हुआ। उन दिनों इंदू सोनाली का कहीं नामोनिशां तक नहीं था। मनोज तिवारी अभिनीत फिल्‍म ‘मंगलसूत्र’ में उसी ‘नथुनिया जबसे…’ गीत को गाकर इंदू सोनाली ने भोजपुरी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कदम रखा।’’

बिनय जी ने खुद कहा कि मैंने इस गाने को कल्‍पना से बहुत बेहतर गाया है

पुरानी बातों को याद करते हुए तनु आगे बताती हैं, ‘‘नथुनिया जबसे पहिरले बानी’ एलबम में ही एक गीत था- ‘बहियां छोड़ा के गईला…’, जो ‘फकीरा’ के एक सुपर हिट गाने ‘दिल में तुझाके बिठाके, कर लूंगी मैं बंद आंखें…’ की धुन पर आधारित था। उधर विनय बिहारी जी ने उसी धुन पर किसी और एलबम के लिए कल्‍पना पटवारी से भी गवाया था। मगर उन्‍होंने जब मेरा गीत सुना तो मुझे फोन कर कहा कि तुमने कल्‍पना से काफी बेहतर गाया है। विनय जी तब मुझे पहचानते नहीं थे। इस घटना के काफी दिनों बाद मैं दिनेश लाल के साथ जब एक कार्यक्रम में शिरकत करने मुंबई आयी तो कल्‍पना से मिलने चली गयी। इत्‍तफाक से वहां विनय बिहारी जी भी मौजूद थे। उनसे कल्‍पना के पति परवेज ने मेरा परिचय करवाया। थोड़ी बातचीत के बाद मैं वहां से निकल गयी। अभी ऑटो में बैठने ही जा रही थी कि विनय बिहारी जी ने पीछे से मुझे आवाज दी और पूछा कि मैं कहां जा रही हूं। मैंने कहा कि आज मेरा शो है और कल गांव जाने के लिए टिकट करवा रखा है, सो कल गांव चली जाऊंगी। विनय बिहारी जी ने कहा कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। मुझे रुकना चाहिए। उनके कहने पर मैंने अपना टिकट कैंसल करवा दिया।’’

विनय बिहारी के कहने पर तनुप्रिया रुक तो गयीं, लेकिन उसके बाद क्‍या हुआ…कामयाबी जब तनु के कदमों में आ रही थी तो उन्‍होंने गीत-संगीत की दुनिया से अचानक खुद को एक लंबे अर्से तक दूर क्‍यों कर लिया…आज की तारीख में अश्‍लीलता का पर्याय बन चुकी भोजपुरी के उद्धार के लिए वो क्‍या करना चाहती हैं….आदि। इन सारे सवालों का जवाब पढ़िए अगल कड़ी में।  

2,147 thoughts on “बिना काम के मैंने कभी किसी स्‍टूडियो में रात को रुकना पसंद नहीं किया- तनुप्रियंका

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